बसन्त ऋतु का आगमन होते ही मौसमी फूलों की सुगंध से पतझड़ में भी बहार आ जाती है। गूंगे भी प्यार के गीत गुनगुनाने लगते हैं, अंधे भी अपनी मन की आँखों से प्रकृति के इस सुहाने दृश्य की अनुभूति करने लगते हैं। ऐसा मैंने लोगों से सुना था।
पर मै तो हर वर्ष बसन्त का इंतजार करता और अपनी कल्पना की पुस्तक में एक और अध्याय जोड़ लेता था। क्योंकि बसन्त की जो परिभासा मैंने बचपन से सुनी थी, उसकी अनुभूति मुझे आज तक नहीं हो पायी थी। मुझे लगा कि शायद मुझे बसन्त का अनुभव कभी नहीं हो सकता। लेकिन ये क्या इस वर्ष का बसन्त ऐसे आया की मन के तार झनझना उठे, अधर से गीत गुन-गुना उठे, और मै लिखने पर मजबूर हो गया। वैसे तो यह मौसम ऐसा होता है कि इसमें हर जीव जिसमे ह्रदय है, प्रफुल्लित हो जाता है, पतझड़ में भी बहार आ जाती है। ह्रदय ऐसे उद्वेगित हो जाता है, जैसे उसमे ऐसी उर्जा का संचार हो गया हो कि वह कल्पना के पर लगा कर किसी नयी दुनिया में जाने को आतुर हो।
आज मुझे एहसास हुआ कि बसन्त का वास्तविक आनंद क्या होता है। आज मुझे ऐसा लग रहा है कि मैंने अपनी कल्पना की पुस्तक में जो भी अप्रकाशित अध्याय आज तक लिखे हैं, वो एक-एक करके मेरी आँखों के सामने आ कर मुझे आनंदित होने का आमंत्रण दे रहें हों। और मुझे आनंद कि उस दुनियां में जाने को विबस कर रहे हों, जो आज तक सिर्फ मेरी कल्पना में थी। इस प्रकार आज मै बसन्त का जो स्वरुप अपने जीवन में देख रहा हूँ, वह मेरे लिए किसी स्वर्ग की अनुभूति से कम नहीं है। आज मुझे ऐसा लग रहा है कि इस बसन्त पर सिर्फ मेरा अधिपत्य है, और यह सिर्फ मेरे लिए आया है। क्योंकि बसन्त का आनंद तभी होता है, जब कोई अपना, अपने पास खुद बसन्त कि सुगंध ले कर आये, और इस मन को इतना सुगन्धित कर दे कि सदियों तक इस बसन्त की सुगंध महसूस होती रहें।

6 comments:
so nice...
प्रेयसी के भाव भरे प्रेमपत्र के समान
रूठे मनमीत को मनाने आज आ गए।
करने सिंगार फिर से प्रकृति सुंदरी का
छोड़ अपना समस्त कामकाज आ गए।
नवकोपलों से सजे द्रुम डालियों के दल
मुस्कुराती कलियों का ले समाज आ गए।
कामनाओं को जगाने सुप्त सपने सजाने
रंग अपना जमाने ऋतुराज आ गए।
B.P. Yadav
आ रही हिमालय से पुकार
है उदधि गजरता बार-बार
प्राची पश्चिम भू नभ अपार
सब पूछ रहे हैं दिग-दिगंत-
वीरों का कैसा हो बसंत
फूली सरसों ने दिया रंग
मधु लेकर आ पहुँचा अनंग
वधु वसुधा पुलकित अंग-अंग
है वीर देश में किंतुं कंत-
वीरों का कैसा हो वसंत
भर रही कोकिला इधर तान
मारू बाजे पर उधर गान
है रंग और रण का विधान
मिलने को आए हैं आदि अंत-
वीरों का कैसा हो वसंत
B.P. Yadav
आ रही हिमालय से पुकार
है उदधि गजरता बार-बार
प्राची पश्चिम भू नभ अपार
सब पूछ रहे हैं दिग-दिगंत-
वीरों का कैसा हो बसंत
फूली सरसों ने दिया रंग
मधु लेकर आ पहुँचा अनंग
वधु वसुधा पुलकित अंग-अंग
है वीर देश में किंतुं कंत-
वीरों का कैसा हो वसंत
भर रही कोकिला इधर तान
मारू बाजे पर उधर गान
है रंग और रण का विधान
मिलने को आए हैं आदि अंत-
वीरों का कैसा हो वसंत
B.P. Yadav
apna apna basant to bahut achha hai...
Basant to sabko basanti kar deta hai...............aur aapka basant to bahut pyaara hai.
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