Tuesday, January 31, 2012

"तन्हाँ ज़िन्दगी "


तन्हाई एक ऐसा शब्द है, जिसको परिभाषित करने की आवश्यकता तो नहीं है पर इसके कार्य, प्रकार और विस्तार को बताना आवश्यक है। वैसे तो तन्हाई कई प्रकार की होती है, पर इन सबके कार्य सिर्फ इंसान की हँसती-खेलती दुनिया में आग लगाना है। यह एक ऐसा असाध्य रोग है जो एक बार किसी के करीब आ जाय तो उसे अकेलेपन के ऐसे अँधेरे में खींच ले जाता है, जहाँ से निकलना बहुत मुश्किल होता है। तन्हाई का दर्द वैसे तो दिखाई नहीं देता लेकिन जिसे होता है उसे पूरी तरह तोड़ के रख देता है।
क्योंकि यह एक ऐसा एहसास है जिससे इंसान भरी महफ़िल में भी खुद को अकेला महसूस करता है। और अपने दिल की भावनाओ को किसी से कहता भी नहीं है, पर तन्हाँ ज़िन्दगी जीने पर मजबूर हो जाता है।

ऐसा नहीं है की तन्हाई हर पल आपको दुःख ही दे, कभी-कभी इंसान खुद से भी तन्हा रहना चाहता है। और कभी-कभी इंसान को तन्हाँ कर दिया जाता है। जब इंसान को जान बुझ कर तन्हां किया जाता है तो इंसान को दोहरा कस्ट होता है। वैसे तो इंसान के अन्दर इश्वर ने हर कठिनाईयों से लड़ने की शक्ति दी है। पर जब किसी मानवीय एवं सामाजिक आडम्बर और ढोंग से किसी को तन्हा किया जाता है, तो उसकी सारी शक्तियां उसका साथ छोड़ देती हैं। और वह इस तन्हाई की पीड़ा से इतना बेहाल हो जाते हैं कि उसका जीना भी मुस्किल हो जाता है।
पर इसका मतलब ये नहीं कि वो जीना छोड़ दे। वो हसना भूल जाएँ। अपनी ज़िन्दगी से रूठ जायं। ऐसा करने से आप कायर कहे जायेंगे। इसलिए आपको सारी चुनौतियों को स्वीकार  करते हुए जीवन में आगे बढ़ना चाहिए, क्योंकि आप इस संसार के सबसे बड़े बुद्धजीवी हैं। और आपको हर मुश्किलों का सामना करना है।
और जब आप ऐसा करने में सफल होते हैं तो आपकी तन्हाई भी आपके लिए खुशियाँ ले के आती है। और आपकी तन्हाँ ज़िन्दगी भी आपको प्यारी लगने लगती है।

 

3 comments:

Anonymous said...

interesting...

Kavita Yadav said...

its very nice...

Priya Awasthi said...

Tanhaayi ka bhi apna kza hai...........