शिक्षक, व्यक्तित्व निर्माण का सांचा होता है। जैसा सांचा होगा वैसा ही प्रतिरूप ढलेगा, इसलिए शिक्षक को अपने दायित्व को भली-भाति समझना चाहिए।
शिक्षक अपनी गरिमा समझें तथा उसे चरितार्थ कर दिखने में परिस्थितियों से भी तालमेल बिठाते हुए देश के भावी नागरिकों का निर्माण करें। प्रत्येक अध्यापक को अपने संपर्क के छात्रों में शालीनता, सज्जनता, श्रमशीलता, जिम्मेदारी, बहादुरी, इमानदारी और समझदारी जैसी प्रवित्तियों को विकसित करने के लिए जीवन भर प्रयत्न करते रहना चाहिए, जिससे देश का नौजवान भटके नहीं। एक महान पुरुष बनाने में अध्यापक की बहुत बड़ी भूमिका रहती है। छात्र अपने अध्यापक को अपना आदर्श मानते हैं, उसकी हर बात को सही मान कर ग्रहण करते हैं।
हमारे देश, समाज, सभ्यता और संस्कृति का बहुत कुछ भार शिक्षकों के कन्धों पर ही है। अपने इस उत्तरदायित्व को समझते हुए बच्चों के उत्क्रिस्ट व्यक्तित्व का निर्माण करने में अधिकाधिक ध्यान रखना आज अध्यापक वर्ग का परम कर्तब्य है।
प्रतिभाएं हर छेत्र में आगे रहती हैं और उन पर उत्तर्दयित्यों का बोझ लदा होता है। यही कारण है कि प्रतिभा प्रचंड शक्तियों में से एक महत्वपूर्ण ईश्वरीय बिभूति मानी गयी है।प्रतिभाये सभी छेत्रों में मौजूद हैं। साहित्य, कला, चिकित्सा, विज्ञान, अध्यापन, संगठन एवं निर्माण जैसे कार्यो में अपनी तत्परता के साथ बहुत कुछ कर रही हैं। इनमें शिक्षक ही सबसे महान है, क्योंकि ये सारी बिभूतियाँ इन्ही के द्वारा गढ़ी जाती हैं। इन्हें अपने अधिकार से ज्यादा कर्तब्य का ध्यान रखना चाहिए। ज्ञानदान महादान है। एक अनपढ़ को सुगढ़ बनाने का कार्य गुरु ही करता है। अतः शिक्षक में उच्चस्तरीय चरित्र, व्यक्तित्व एवं शिक्षण में इमानदारी जैसी विशेषताएं होनी चाहिए, क्योंकि इन्ही की छाया में छात्रों को अपने अनुकूल ढालना आसान हो जाता है।
अध्यापक को अपने स्वाभिमान और सम्मान की रक्षा करने के लिए स्वयं प्रयास करने चाहिए। यह तभी संभव है, जब शिक्षक अपने दायित्व और कर्तव्य के प्रति सचेत रहे। अच्छे देशभक्त, संस्कारवान और सभ्य नागरिकों को देश को देना अध्यापकों के हाथ में है। शिक्षक की महानता इसमें है की वह अपने अधिकारों से अधिक कर्त्तव्य का ध्यान रखें। शिक्षकों के पास एक बहुत बड़ी शक्ति है, उसे उन्हें समझना ही चाहिए। शिक्षक बालकों के पारिवारिक दायित्यों का बोध करा सकते हैं, समाजनिस्ठ बने रहने की शिक्षा और प्रेरणा दे सकते हैं। ऐसे जीवन सूत्रों को अध्यापक बड़ी सहजता से जीवन में उतारने की शिक्षा दे सकते हैं।
प्यार और आत्मीयता के व्यवहार से शिक्षक यदि अपनी बात छात्र वर्ग से मनवाने के लिए तैयार कर ले तो समाज में कैसा भी, कोई भी परिवर्तन कराना उनके लिए कठिन नहीं होगा। बालक की मनोंवृत्तियां मक्खन जैसी कोमल होती हैं, उन्हें आसानी से पिघलाया जा सकता है, यह कलाकारी अध्यापक को आनी चाहिए।
झाँसी की रानी, चन्द्रगुप्त, विवेकानंद, गाँधी, कस्तूरबा, निवेदिता आज भी इसी समाज में ही उत्पन्न हुए हैं। यह तो अभी ही वर्तमान का इतिहास है तो आज के बालक भी ऐसे ही बन सकते हैं। शिक्षकों को बस थोडा सा प्रयास अधिक करना पड़ेगा।
बल, धन से सारी प्रतिभाएं खरीदी जा रही हैं, परन्तु शिक्षक को तो इस प्रलोभन के आगे नहीं झुकना चाहिए, चाहे कुछ हो जाये। गुरु परमात्मा के बाद साक्षात् स्रष्टा की भूमिका निभाता है। देश को बनाने की सारी जिम्मेदारी आज अध्यापक वर्ग के ऊपर है। यदि आपने अध्यापन का कार्य चुना है तो तो देश हित के लिए समाज-निर्माण करने का दायित्व भी पूरा करने का संकल्प लेना चाहिए। पतन-पराभव से समाज को बचा लेने की क्षमता सिर्फ शिक्षक वर्ग में ही है। प्रत्येक शिक्षक को बोध होना चाहिए की सतयुगी वातावरण बनाने में उसी की भूमिका की सराहना होगी।
अध्यापक अपनी प्रतिभा को पहचानें और व्यक्ति निर्माण में उसका नियोजन करें। समाज के हर वर्ग को मार्गदर्शन देना अध्यापक की जिम्मेदारी है।

6 comments:
e to bahut hi achha sujhaw hai????
very nice...
its very nice.....
i like this type of thought.......
Realy Teacher will be change society
Very nice........
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