"एक सपना"
रोज की तरह आज भी कविता अपने - आप से बातें करती जा रही थी, क्या हैं ये सपने? क्यों देखते हैं हम सपने ? अगर ये सपने इन्सान होते तो, मै इनसे जरुर पूछती कि क्यों आते हो मेरे पास ? पर इन सपनो से क्या सवाल करना जो हमें एक पल में ही ज़िन्दगी के सारे सच दिखा के ऐसे गायब हो जाते हैं, जैसे काले बादलों में सूरज। मगर करूँ तो क्या करूँ ?
सपने मेरी आदत बन चुके हैं, वे तो जागते हुए भी मेरी आँखों में छा जाते हैं, मै चौंक जाती हूँ, सोचती हूँ एक-आध सपना कस कर अपनी मुठ्ठी में रख लूँ, पर सपने तो ऐसे उड़ जाते हैं जैसे खुले में रखा कपूर। सपने भी सच होते हैं, ये तो बीते ज़माने कि बातें लगाती हैं। हो भी क्यों न , जब आज सच सच जैसा नहीं रहा तो सपने भला कैसे सच होंगे।

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